Srishti Ki Rachna – Srishti Puran सृस्टि की रचना – सृस्टि पुराण

सृस्टि की रचना – सृस्टि पुराण

प्रथम अध्याय : –

सृस्टि की रचना के बारे में अनेक प्रकार के तथ्य प्रचलित है और अनेको प्रकार के किताबो में अलग अलग कहानिया व कथाये लिखी हुई है परन्तु उन सब में अनेको प्रकार की भ्रांतिया भी प्रचलित है जिनके परिणामस्वरूप हिन्दू धर्म यानि सनातन धर्म को लोगो ने गलत तरीके से समझा है |

आज हम आपको यह नहीं कहेंगे कि हम सही है और पहले के शास्त्र या पुराण गलत है या उन्होंने जो जानकारी दी है वो गलत है हमारा ऐसा कोई उद्देशय नहीं है आप ऐसा समझ लीजिये कि हम जो भी बता रहे है वो हमारी मन की कल्पना मात्र है और इसमें हम पहले से रचित पात्रो का उपयोग करेंगे |

जब हमारी सृस्टि नहीं थी और कोई भी प्राणी धरती पर उपलब्ध नहीं था तब से पहले भी हमारी सृस्टि में आज ही की तरह इंसान और अन्य प्रकार के प्राणी उपलब्ध थे लेकिन इस सृस्टि के नियमो के अनुसार चार युगो के समाप्त होने के पश्चात एक बार इस सृस्टि में प्रलय होता है और सृस्टि प्राणी और जीवन के अंश को त्याग देती है और तब फिर से परमात्मा एक नए युग के साथ नयी सृस्टि की रचना करते है और नये प्राणी और नये नियम बनाये जाते है तो जिस प्रकार हमारी पहले की सृस्टि का प्रलय के कारण अंत हुआ और उसके पश्चात सुरु हुआ नई सृस्टि की रचना का प्रकरण आइये जानते है कैसे हुई होगी हमारी सृस्टि की रचना जिसमे हम अभी जीवनयापन कर रहे है|

सृस्टि रचना की कहानी जानने से पहले हमे जाननी होगी की प्रलय के बाद क्या हुआ होगा और जब प्रलय हो गया था तो उसके पश्चात धरती पर और अन्य ग्रहो पर क्या बचा होगा और किसने देखा होगा की सृस्टि की रचना कैसे हुई क्यूंकि उस समय तो सृस्टि पर जीवन था ही नहीं और ना ही कोई मानव या और कोई प्राणी इस धरती पर बचा था तो फिर कैसे पता चली यह कहानी की सृस्टि की रचना कैसे हुई |

सृस्टि रचना की कहानी सृस्टि रचना के बहुत समय पश्चात पता चला इसे सुना एक ऐसे इंसान ने जो गाये चरता था यानि एक ग्वाला था और उसके साथ था एक तोता जिसने सुनी पूरी कहानी कैसे आइये जानते है|

एक बार की बात है भगवान् शिव की अर्धांगिनी पारवती ने शिव से पूछा कि इस सृस्टि की रचना कैसे हुई और किसने की इस सृस्टि की रचना जिसको आप समय चक्र के अनुसार चला रहे हो तब भगवान् शिव ने पारवती से कहा कि हे देवी ! आप उस कहानी को इस तरह से नहीं सुन सकती उस कहानी को जानने के लिए इस सृस्टि के समय चक्र को रोकना होगा ताकि कोई भी इस जानकारी को सुनकर इसका गलत फायदा ना उठा सके तो माँ पारवती ने कहा कि हे प्रभु !  हम इस तरह से किसी भी समय चक्र को नहीं रोक सकते ऐसा करने से सृस्टि का संतुलन बिगड़ जायेगा. परन्तु भगवान शिव को यह पता चल गया था कि पारवती के जरिये इस सुचना को इंसानो तक पहुँचाना ही होगा लेकिन यह जानकारी किसी भी ऐसे व्यक्ति को नहीं दी सकती जो धरती का निवासी हो लेकिन इस जानकारी को धरती पर ही पहुँचाना होगा. तब भगवान् शिव ने पारवती को कुछ समय रुकने के लिए कहा और वो स्वयं भगवान विष्णु के पास चले गए और उन्हें यह सारी बाते बताई तब भगवान् विष्णु ने उन्हें उपाय सुझाया कि में स्वयं धरती पर मानव रूप में अवतार लूंगा और इस जानकारी को आपके जरिये मेरा वो रूप सुनेगा और ऋषि मुनियो के जरिये धरती पर पीढ़ी दर पीढ़ी इस जानकारी को आगे पहुँचाया जायेगा |

तब भगवान् विष्णु ने सानिध नाम के ग्वाले के रूप में धरती पर अवतार लिया और वो जंगल में गाये चराने जाते थे वही पर उन्हें एक तोता मिल गया था जिसको सानिध ने पाल लिया और वो तोता सानिध के साथ रहने लग गया और जब सानिध गाये चराने जाता तब वो तोता भी सानिध के साथ जाता और अब जब सानिध २० साल का एक युवा हो चूका जिसे सम्पूर्ण जानकारी हो गई थी और वो सब कुछ समझने लग गया था तब भगवान शिव ने सोचा कि यही सही समय है जब मै सृस्टि रचना कि कहानी पारवती के जरिये इंसानो तक यानि सानीध तक पहुँचाहु और भगवान् शिव माँ पारवती को लेकर उसी जंगल में पहुँच गए जिस जंगल में सानिध गाये चराता था भगवान् शिव सृस्टि रचना कि कहानी सुरु करने ही वाले थे कि माँ पारवती ने कहा कि रुकिए प्रभु इस तरह से सभी इंसान इस कहानी को सुन लेंगे जो यंहा आस पास होंगे तो फिर कोई मानव इस जानकारी का गलत उपयोग कर सकता है तब भगवन शिव ने कहा कि ठीक हे देवी मै यंहा उपस्तिथ सभी मानवो को समय चक्र में बांध देता हु तब भगवन शिव ने उन इंसानो को समय चक्र में बांध दिया और एक शर्त रखी कि वो इंसान समय चक्र में बंध जायेंगे जो एकल होंगे और जो किसी मनुष्य के अलावा किसी अन्य प्राणी के को छूकर रहेगा वो समय के इस चक्र में नहीं बंधेगा तो उस समय उपस्थित सभी लोग में से एक ही इंसान ऐसा था सानिध जो तोते को छूकर रखा था यानि इंसान के अलावा किसी अन्य प्राणी को छुए हुए था यानि वो तोता सनिध के कंधे पर बैठा था जिसकी वजह से सानिध समय के चक्र में नहीं बंधा और वो ही इस कहानी का साक्षी था |

फिर शुरू की भगवान् शिव ने सृस्टि रचना कि कहानी |

तो सुनो देवी जब इस सृस्टि में कुछ भी नहीं था यंहा तक कि हम भी नहीं थे तब इस सृस्टि में एक ही परम सत्ता थी जिसने इस सृस्टि कि रचना के बारे में सोचा और इस सृस्टि कि उत्पत्ति के लिए हमे यानि त्रिदेवो को उत्त्पन किया |

सबसे पहले परम सत्ता ने आठ पिंडो की रचना की और उनको स्वरुप देने में लग गयी लेकिन पहले पांच पिंड कि रचना सही प्रकार से नहीं हुई और और परम सत्ता ने उन पांचो पिंडो को नष्ट कर दिया और बाकि बचे तीन पिंडो की रचना की और उन्हें हमारा स्वरुप दिया जिसमे सबसे पहले उस परम सत्ता ने ब्रम्हा विष्णु और मुझे शिव को उत्पन्न किया और हमे अलग अलग कार्यक्षेत्र दिए गए और सृस्टि रचना कि जिम्मेदारी हम तीनो को सौंपी गयी |

भगवान् ब्रह्मा को सृस्टि की रचना की जिम्मेदारी सौंपी गयी और भगवान् विष्णु को सृस्टि को संतुलित करने के लिए सृस्टि का पालन करने की जिम्मेदारी सौंपी गयी और मुझे यानि शिव को सृस्टि के प्राणियों का और अधर्मी लोगो का और सृस्टि के संतुलन को बनाये रखने के लिए संहार करने की जिम्मेदारी दी गयी |

फिर परमसत्ता के आदेशानुसार ब्रह्मा और विष्णु ने अपने अपने एक एक अंश को अलग किया और उन्हें अपनी अर्धांगिनी के रूप में माँ सरस्वती और माँ लक्ष्मी को उत्पन्न किया और उन्हें भी ज्ञान और धन कि देवी के रूप में उनकी अलग अलग जिम्मेदारी सौंपी गयी परन्तु मेने अपने अंश को अलग नहीं किया और अपने अंश को स्वयं के अंदर नई समाहित रखा ताकि समय आने पर मै अपने अंश को उत्पन्न करु और सृस्टि के संहार के कार्य में मेरी मदद करे. परन्तु सृस्टि की रचना को पूर्ण करने के लिए अर्धांगिनी कि आवस्यकता होती है तब परमसत्ता के आदेशानुसार मेने अपना १०० वां हिस्सा अलग किया और उसे मानवो के बिच भेज दिया ताकि वो मानव अवतार लेकर अपना जीवन यापन करे और तब तक संहार के कार्य में किसी भी प्रकार की रुकावट ना आये |

आगे की कहानी अगले भाग में प्रकाशित कि जाएगी इस कहानी के जरिये हमारा मकसद किसी कि भावनाओ को ठेश पहुंचना या किसी धर्म ग्रंथो कि बुराई करना नहीं है यह सिर्फ एक काल्पनिक कहानी है जिसके पात्र हिंदी धर्म ग्रंथो से लिए गए है इसका कोई भी गलत मतलब न निकले

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